वो नारी है

न बँटी मिठाई उसके होने की,
न दी किसीको बख़्शीश,
न मुस्कुराहट किसी के चेहरे पर,
सुनाई दी बस माँ की चीख,

न छिक के दूध पिया कभी माँ का,
न मिली कभी छाती की ठंडक,
न मिला पिता के नाम का गुरूर,
आत्मा बन गई शरीर में बंधक,

न बांधी राखी कलाई पर बहन ने
केसे खाए वो भी कसमें रक्षा करने की
न मिली शरारत न दोस्ती भाई की
क्या यही है सच्चाई जीवन की?

न खेला लुकाछिपी कभी
न कभी रूठना मनाना न कोई मनमानी
कभी गाली में भीगी रोटी मिली
कभी आसुओं में घुला पानी

नोचा कभी आंखों से
कभी आत्मा छलनी करी
शरीर को दुत्कारा उसके
क्या वो इंसान नहीं?

ऊपर वाले ने भी क्या खूब तक़दीर लिखी है
कलम टूट गयी शायद काँटों की मदद ली है

हां वो त्रस्त है
वो ग्रस्त है
ज़िन्दगी से परास्त है
फिर भी न नाराज़ है
न हताश है
जो भी है
जैसी भी है
किसी से न आश्वस्त है
शरीर है सराय नहीं
माँस के लोथड़ों का गुलाम नहीं
न तुझ में है
न मुझ में है
वो नारी है
क्या उसे जीने का सम्मान नहीं??

 

‘Written for #CauseAChatter ‘ by Blogchatter .

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